Monday, 5 October 2015

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू  …


गमो के बादलोसे
लीपटी हुई तस्वीर
या रेगीस्थान मे रेतसी
बिखरी हुई तकदीर …

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …

झरनोसे गिरते फ़िसलते
बुन्दोके ख्वाबो की आशा
अपने आपमे सिमटीसी
कहू ब्रम्हांड की परिभाषा

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …

अपनीही राह पर 
भटका हुआ मुसाफिर 
या शब्दो के जालो को 
सुलझाता हुआ कबीर 

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू … 

कब्रीस्थां के सन्नाटोसे 
चीरती चीखती आवाज 
या दलदलो के सिनेमे 
गढे हुये रिती-रिवाज   

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू … 

गरगराते घुमघुमाते 
साजीशोके बवंडर  
या जन्म मृत्यू से रुबरु 
परेशान सा सिकंदर … 

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …

-प्रवीण बाबूलाल हटकर 

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