.. वक्त ...
वक्त से बांधी है
तेरी, मेरी डोर ।
चंद्रमा-चकोर
जैसे हम ।।
तेरी, मेरी डोर ।
चंद्रमा-चकोर
जैसे हम ।।
वक्त तो जाता है
यादो को छोड के ।
फिर ये मुडके
नही आता ।।
यादो को छोड के ।
फिर ये मुडके
नही आता ।।
वक्त निरंतर
चलता रहता ।
न कभी रुकता
पलभर ।।
चलता रहता ।
न कभी रुकता
पलभर ।।
वक्त सिखलाता
अपने, गैरो की ।
अच्छे या बुरे की
पहचान ।।
अपने, गैरो की ।
अच्छे या बुरे की
पहचान ।।
ये वक्त की लाठी
चलना सिखाती ।
राह दिखलाती
गुरु जैसी ।।
चलना सिखाती ।
राह दिखलाती
गुरु जैसी ।।
वक्त की उंगली
थाम कर चलो ।
मंजिल को पालो
आसान से ।।
(अभंग ... )
थाम कर चलो ।
मंजिल को पालो
आसान से ।।
(अभंग ... )
- प्रवीण हटकर, अकोला

No comments:
Post a Comment