Sunday, 13 August 2017

.. डर ...
लाख बुरा सोचो
डर डर जाये ।
सामने ना आये
सच्चाई के ।।



डर से ना डरो
डर को भगाओ ।
पुत्र कहलाओ
चट्टानो के ।।

डर अंदरसे
पिघलाता हमे ।
दिखलाता हमे
कमजोर ।।

प्रवीण बोल है
डर वहम है ।
झूठ छलावा है
फरेब सा ।।

डर दिखता है
ये कब्रिस्ता जैसा ।
हा सन्नाटे जैसा
चेहरेपे ।।

डर के सामने
कभी ना झुकना ।
निडर तू होना
अंत तक ।।

डर पे विजय
बनाये निडर ।
कोसो दूर डर
भाग जाये ।।

(अभंग...)
- प्रवीण बाबूलाल हटकर

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