Sunday, 13 August 2017

चट्टानोसे पुछो

सब्र क्या होता है ।


उम्र क्या होती है 


सेहने की ।।


धूप, छाव या हो

तुफान, सैलाब ।


मै खडा नवाब


की तरह ।।



एक ही हौसला

डटे रहना है ।

खडे रहना है

निरंतर ।।


कुछ अंदर है

उबला हुआ सा ।


लाव्हा पिघला सा


ज्वालामुखी ।।

बस फटने की

कतार पर है ।

फिर दबाये है

हौसलो से ।।

प्रवीण कहे रे
पक्के तुम बनो ।
चट्टानसा बनो
मजबूत ।।
(अभंग ...)
- प्रवीण हटकर, अकोला

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