Sunday, 13 August 2017

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …


गमो के बादलोसे

लीपटी हुई तस्वीर

या रेगीस्थान मे रेतसी

बिखरी हुई तकदीर …

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …


झरनोसे गिरते फ़िसलते

बुन्दोके ख्वाबो की आशा


अपने आपमे सिमटीसी

कहू ब्रम्हांड की परिभाषा

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …



अपनीही राह पर

भटका हुआ मुसाफिर

या शब्दो के जालो को

सुलझाता हुआ कबीर


ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …



कब्रीस्थां के सन्नाटोसे

चीरती चीखती आवाज

या दलदलो के सिनेमे

गढे हुये रिती-रिवाज

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …



गरगराते घुमघुमाते

साजीशोके बवंडर

या जनम मृत्यू से रुबरु

परेशान सा सिकंदर …
ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …


-प्रवीण बाबूलाल हटकर

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