Saturday, 19 August 2017

..........तू ..........

विठ्ठला तू यावे 

बनून अंबर !

होऊन छप्पर 

आधारावे !!


विठ्ठला तू घ्यावे 


आम्हास कवेत !

फेकुनी हवेत 

बा… झेलावे !!


विठ्ठला तू द्यावे 

हातात लेखन !

देत शिकवण


गिरवावे !!


विठ्ठला तू व्हावे


अमुचे नशीब !

जीवन हिशोब 


जुळवावे !!



विठ्ठला तू जावे


तुझ्यात घेऊन !

तुझ्यात ठेऊन


सुखवावे !!


(अभंग… )

-प्रवीण बाबूलाल हटकर
|| घाव ||
काळ गेला परतुनी आठवात का?
घाव ऐसा कस्तुरी काळजात का?
कोपरा अन कोपरा मनघरातला;
चिंब होतो बरसुनी आसवात का?
चिंब दोघे जाहलो, चिंब हे नगर;
झिंगलेली ही नशा पावसात का?
रंगतो अन दंगतो, झिंगतो असा;
कोकिळेचा सूर हा श्रावणात का?
पोळले अन करपले मन भकास हे;
दूर देशी तू उभी वादळात का?
पाहता मी हरपलो, विसरलो जगा;
लाघवी गं रूप हे आरशात का?
भेटताना आठवी माळरान अन;
हात हाती शोधतो वावरात का?
ओठ ओठी चुंबता केवढी पहा;
लाजता तू लाजली आज रात का?
- प्रवीण बाबूलाल हटकर, अकोला

Sunday, 13 August 2017

ऐ खुदा मुझे मुआफ करना…

आसमा की उचाई,
समंदर की गेहराई,
दिवाली की रोशणाई ,
गुंजती शेहनाई ,
कुबेर की दौलत ,
शेहन्शाह की शोहरत,
फकीर की दुआ ,
वैद की दवा,
जिंदगी का जुआ ,
या मौत का कुआ,
रेगीस्ता की रेत ,
बंजर जमी खेत ,
कब्रीस्ता की खामोश राते
गुंगे के जबां पे लिपटी बाते,

"ऐ खुदा मुझे मुआफ करना",
मुझे हर ओ चीज कम नजर आयी ,
जभी मुझे वो गम मे नजर आयी …
जभी मुझे वो गम मे नजर आयी …

-प्रवीण बाबुलाल हटकर
(एक गोली चली … )

एक गोली चली इधरसे
एक गोली चली उधरसे,
एक माता रोयी इधरसे
एक माता रोयी उधरसे …

घायाल हुई थी सरहद
बेजुबान सी थी सरहद
बारूद बम धमाकोसे ये 
कब्रीस्थान लगी सरहद …
(एक गोली चली … )

शहीद हुआ सरहद पे
बेटा, शोहर किसीका भाई
नफरत के इस जंग मे
जान वापस किसीकी आयी ? …
(एक गोली चली … )

केसरी हरे नीले रंगोकी
पेहचान ये कैसे बताऊ
लाल रंग से था लतपत
किसका खून ,किसे दिखाऊ …
(एक गोली चली … )

बढी दूरिया सरहद से
ना दिलो मे बढी दूरिया
ईद दिवाली साथ मनाये
देखी रीश्तोमे नजदीकिया
(एक गोली चली … )

- प्रवीण बाबूलाल हटकर
ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …


गमो के बादलोसे

लीपटी हुई तस्वीर

या रेगीस्थान मे रेतसी

बिखरी हुई तकदीर …

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …


झरनोसे गिरते फ़िसलते

बुन्दोके ख्वाबो की आशा


अपने आपमे सिमटीसी

कहू ब्रम्हांड की परिभाषा

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …



अपनीही राह पर

भटका हुआ मुसाफिर

या शब्दो के जालो को

सुलझाता हुआ कबीर


ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …



कब्रीस्थां के सन्नाटोसे

चीरती चीखती आवाज

या दलदलो के सिनेमे

गढे हुये रिती-रिवाज

ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …



गरगराते घुमघुमाते

साजीशोके बवंडर

या जनम मृत्यू से रुबरु

परेशान सा सिकंदर …
ऐ जिंदगी तुझे क्या कहू …


-प्रवीण बाबूलाल हटकर
.. डर ...
लाख बुरा सोचो
डर डर जाये ।
सामने ना आये
सच्चाई के ।।



डर से ना डरो
डर को भगाओ ।
पुत्र कहलाओ
चट्टानो के ।।

डर अंदरसे
पिघलाता हमे ।
दिखलाता हमे
कमजोर ।।

प्रवीण बोल है
डर वहम है ।
झूठ छलावा है
फरेब सा ।।

डर दिखता है
ये कब्रिस्ता जैसा ।
हा सन्नाटे जैसा
चेहरेपे ।।

डर के सामने
कभी ना झुकना ।
निडर तू होना
अंत तक ।।

डर पे विजय
बनाये निडर ।
कोसो दूर डर
भाग जाये ।।

(अभंग...)
- प्रवीण बाबूलाल हटकर
चट्टानोसे पुछो

सब्र क्या होता है ।


उम्र क्या होती है 


सेहने की ।।


धूप, छाव या हो

तुफान, सैलाब ।


मै खडा नवाब


की तरह ।।



एक ही हौसला

डटे रहना है ।

खडे रहना है

निरंतर ।।


कुछ अंदर है

उबला हुआ सा ।


लाव्हा पिघला सा


ज्वालामुखी ।।

बस फटने की

कतार पर है ।

फिर दबाये है

हौसलो से ।।

प्रवीण कहे रे
पक्के तुम बनो ।
चट्टानसा बनो
मजबूत ।।
(अभंग ...)
- प्रवीण हटकर, अकोला